पाठ्यपुस्तक तक ही क्यूँ सीमित न हो कोई अवधारणा
ख़ान, शिफ़ा (2024) पाठ्यपुस्तक तक ही क्यूँ सीमित न हो कोई अवधारणा पाठशाला भीतर और बाहर (21). pp. 57-61.
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Introduction
इस लेख में लेखिका द्वारा किए गए एक छोटे अध्ययन के ब्योरे हैं। पाठ्यपुस्तकों में दिए गए चित्र पाठक की याददाश्त पर कैसे असर डालते हैं, यह जाँचने के लिए उन्होंने यह अध्ययन किया। यह अध्ययन 2 राज्यों (राजस्थान और मध्य प्रदेश) के अलग-अलग समूहों के विज्ञान शिक्षकों और बच्चों के साथ अलग-अलग समय पर किया गया। इस अध्ययन में उन्होंने विज्ञान की एक अवधारणा से जुड़े 5 चित्रों पर शिक्षकों व विद्यार्थियों की राय ली। वे बताती हैं कि पाठ्यपुस्तकों के चित्र और उनकी विषयवस्तु का हमारी याददाश्त पर बहुत गहरा असर होता है। वे अवधारणा बनाने में बहुत मददगार होते हैं, इसलिए इन्हें बहुत सोच समझकर व ध्यान से बनाना चाहिए।
| Item Type: | Article |
|---|---|
| Discipline: | Education |
| Programme: | University Publications > Pathshala Bheetar Aur Baahar |
| Creators(English): | Shifa Khan |
| Publisher: | Azim Premji University |
| Journal or Publication Title(English): | Paathshala Bheetar aur Bahar |
| URI: | http://anuvadasampada.informaticsglobal.ai/id/eprint/4807 |
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Disclaimer
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अनुवाद पहल, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा अँग्रेज़ी से हिन्दी में अनूदित। इस अकादमिक संसाधन का उपयोग केवल ग़ैर-व्यावसायिक, अकादमिक एवं शैक्षिक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
ಅಜೀಂ ಪ್ರೇಮ್ಜಿ ವಿಶ್ವವಿದ್ಯಾಲಯದ ಅನುವಾದ ಉಪಕ್ರಮದ ವತಿಯಿಂದ ಇದನ್ನು ಇಂಗ್ಲೀಷ್ನಿಂದ ಕನ್ನಡಕ್ಕೆ ಅನುವಾದಿಸಲಾಗಿದೆ. ಈ ಶೈಕ್ಷಣಿಕ ಸಂಪನ್ಮೂಲವನ್ನು ವಾಣಿಜ್ಯೇತರ, ಶೈಕ್ಷಣಿಕ ಉದ್ದೇಶಗಳಿಗೆ ಬಳಸಬಹುದಾಗಿದೆ.
